अपनी क्षमताओं को कैसे पहचाने? (How to know self worth?)

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अपनी क्षमताओं को पहचानने का पहला क़दम है अपने आप पर पूरा विश्वास रखना। क्योंकि रुकावटें आने पर सबसे पहले हम अपना विश्वास खो देते हैं। फलस्वरूप अपने काम को भी अधूरा छोड़ देते हैं और बहाना बनाने लगते हैं कि हमारी क़िस्मत ही ख़राब है या हमारे हालात ही ख़राब हैं।

एक बार असफल होने के पश्चात् हम सफल होने के लिए अन्य उपाय खोजने की कोशिश ही नहीं करते क्योंकि हम केवल वही कार्य करना चाहते हैं जो करने में आसान हो। जिसको करने में हमें किसी कठिनाई का सामना न करना पडे।

हमारे अंदर पर्याप्त योग्यताएँ हैं, आवश्यकता है, उनको पहचान कर उनका उपयोग करने की ताकि हम चुनौतियों को न केवल स्वीकार कर सकें बल्कि सफल भी हों।

अरुण एक विद्यार्थी है। कॉलेज में उसके कुछ साथियों ने एक नाटक क्लब बनाया हुआ है। लेकिन अरुण की नाटक में भाग लेने या अभिनय करने की रुचि नहीं थी। उसको लगता था कि उसमें अभिनय करने की योग्यता बिल्कुल भी नहीं है। वह एक अंतर्मुखी युवक था और लोगों से कम ही बातचीत करता था।

वह अपने आप में ही मस्त रहने वाला युवक था। कुछ समय पश्चात् उसके कॉलज में एक नाटक प्रतियोगिता का आयोजन किया गया जिसमें उसके नाटक क्लब के मित्र भाग लेना चाहते थे।

नाटक के लिए सभी मित्र एक सशक्त कहानी की तलाश करने में जुट गए। वे लोग अनेक प्रकार की कहानियों पर चर्चा करने लगे। इस प्रकार कई दिन बीत गए परंतु उन्हें कोई कहानी पसंद नहीं आ रही थी।हर कहानी में उन्हें कोई न कोई त्रुटि दिखाई देती और वे लोग पुनः बहस करने लगते। उचित कहानी का चयन न हो पाने के कारण उनका उत्साह कम होता जा रहा था।

अरुण चुपचाप बैठकर उनकी बहस सुनता रहता। एक बार उसे लगा मानो वह स्वयं कहानी के चुनाव में अपने मित्रों की सहायता कर सकता है। परंतु वह यह सोच कर चुप रह गया कि उसके मित्र तो कलाकार हैं और उसे अभिनय का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं है। इस कारण वह उन्हें कुछ कहने का साहस नहीं जुटा पाया।

उसके मित्र जब कोई निर्णय नहीं ले पा रहे थे तो अरुण ने सोचा क्यों न वह अपना सुझाव मित्रों को बता दे ताकि उनकी समस्या का समाधान हो जाए। परंतु कुछ भी कह पाने का साहस नहीं हो रहा था। अंत में उसने धीमी आवाज़ में उन्हें कुछ बताया पर उसकी धीमी आवाज़ को शोर-गुल में कोई नहीं सुन सका। एक बार पुनः उसने ऊँची आवाज़ में उन्हें बताना आरम्भ किया।

अरुण की ऊँची आवाज़ सुनकर सभी मित्र उसकी ओर आश्चर्य से देखने लगे। अरुण ने कहना आरम्भ किया, “आप सब लोग इतने दिनों से अपने नाटक के नायक पर चर्चा कर रहे हो और आपस में सहमत भी नहीं हो रहे। आप लोग जिस नायक की कल्पना कर रहे हैं वह कोई आम आदमी नहीं बल्कि एक सुपरमैन है।

जीवन के वास्तविक संघर्ष तो आम आदमी झेलता है, सुपरमैन नहीं। मेरे विचार में नाटक का नायक एक आम आदमी होना चाहिए जो कठिन परिश्रम करके अपने जीवन के सभी संघर्षों पर विजय प्राप्त करता है।

यदि हम सुपरमैन के बजाए एक आम आदमी के जीवन और उसके जीवन संघर्ष का मंचन करें तो यह न केवल सुगम होगा बल्कि प्रभावशाली संदेश भी देगा।”

अरुण का सुझाव सभी को बहुत पसंद आया और सब ने मिलकर अरुण की बहुत प्रशंसा की। उन्होंने अरुण से अनुरोध किया कि वह उनके नाटक का निर्देशन भी करे। वैसे तो अरुण बहुत शर्मीला था और कोई सुझाव देने का साहस भी नहीं कर पा रहा था। परंतु जब उसके सुझाव को उसके मित्रों ने न केवल स्वीकार किया बल्कि उसकी प्रशंसा भी की तो अरुण की हिम्मत बहुत बढ़ गई।

उसमें कुछ नया कर गुज़रने का साहस आ गया। अरुण के मित्रों का नाटक मंचन न केवल सफल हुआ बल्कि प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ।

इसी प्रकार जिस दिन हम अपनी सुप्त क्षमताओं को पहचान लेंगे, उस दिन हम अपनी सभी सीमाओं को तोड़ देंगे, जिसमें हम जकड़े हुए हैं।

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