कड़वे प्रवचन : जैन मुनि तरुण सागर जी महाराज के 45 प्रवचन (Muni Tarun Sagar Ji ke Kadve Pravachan)

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प्रवचन-1 “जिंदगी में अच्छे लोगों की तलाश मत करो, खुद अच्छे बन जाओ। आपसे मिलकर शायद किसी की तलाश पूरी हो जाए” -राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-2 “आप सीधे रास्ते चलोगे लोग तब भी कुछ कहेंगे, बेवजह कहेंगे, बेकार की बातें कहेंगे और बार-बार कहेंगे। इसलिए जरूरी है कि सुनने की आदत डालो और अपना काम सहज भाव से करते रहो”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-3 “याद रखना कि जिंदा आदमी ही मुस्कुराएगा, मुर्दा कभी नहीं मुस्कुराता और कुत्ता चाहे तो भी मुस्कुरा नहीं सकता, हंसना तो सिर्फ मनुष्य के भाग्य में ही है। इसीलिए जीवन में सुख आए तो हंस लेना, लेकिन दुख आए तो हंसी में उड़ा देना”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-4 “लक्ष्मी पूजा के काबिल तो है लेकिन भरोसे के काबिल कतई नहीं है। लक्ष्मी की पूजा तो करना मगर लक्ष्मी पर भरोसा मत करना क्योंकि लक्ष्मी स्थिर नहीं है। …और भगवान की पूजा भले ही मत करना लेकिन भगवान पर भरोसा हर-हाल में रखना। क्योंकि वह सदैव अपने भक्त का ध्यान रखते हैं”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-5 “तुम्हारी वजह से जीते जी किसी की आंखों में आंसू आए तो यह सबसे बड़ा पाप है। लोग मरने के बाद तुम्हारे लिए रोए, यह सबसे बड़ा पुण्य है”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-6 “बातचीत जरूरी है लेकिन ग्रहस्थ जीवन में कभी तर्क नहीं करने चाहिए। क्योंकि जहां तर्क है, वहां नर्क है और जहां समर्पण है, वहां स्वर्ग है”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-7 “अमीर होने के बाद भी यदि लालच और पैसों का मोह हैं, तो उससे बड़ा गरीब और कोई नहीं हो सकता। प्रत्येक व्यक्ति ’लाभ’ की कामना करता हैं, लेकिन उसके विपरीत शब्द अर्थात ‘भला’ करने से दूर भागता हैं”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-8 “जिंदगी में माँ, महात्मा और परमात्मा से बढ़कर कुछ भी नहीं हैं | जीवन में तीन आशीर्वाद जरुरी हैं – बचपन में माँ का, जवानी में महात्मा का और बुढ़ापे में परमात्मा का। माँ बचपन को संभाल देती हैं, महात्मा जवानी सुधार देता हैं और बुढ़ापे को परमात्मा संभाल लेता हैं”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-9 “डॉक्टर और गुरु के सामने झूठ मत बोलिए क्योकि यह झूठ बहोत महंगा पड़ सकता हैं। गुरु के सामने झूठ बोलने से पाप का प्रायश्चित नहीं होंगा, डॉक्टर के सामने झूठ बोलने से रोग का निदान नहीं होंगा। डॉक्टर और गुरु के सामने एकदम सरल और तरल बनकर पेश हो, आप कितने भी होशियार क्यों न हो तो भी डॉक्टर और गुरु के सामने अपनी होशियारी मत दिखाना, क्योंकि यहाँ होशियारी बिलकुल काम नहीं आती”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-10 “भले ही लड़ लेना – झगड़ लेना, पिट जाना – पिट देना, मगर बोल चाल बंद मत करना क्योकि बोलचाल के बंद होते ही सुलह के सारे दरवाजे बंद हो जाते हैं”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-11 “कभी तुम्हारे माँ – बाप तुम्हें डाट दे तो बुरा मत मानना बल्कि सोचना – गलती होने पर माँ – बाप नहीं डाटेंगे तो और कौन डाटेंगे, और कभी छोटे से गलती हो जाये तो यह सोचकर उन्हें माफ़ कर देना की गलतिया छोटे नहीं करेंगे तो और कौन करेंगा”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-12 “न तो इतने कड़वे बनो की कोई थूक दे, और ना तो इतने मीठे बनो की कोई निगल जाये”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-13 “विनम्रता में जीने की आदत डालो। हाथ जोड़कर रहो, हाथ बांधकर नहीं। यही खुशहाल जीवन का रहस्य है। क्योंकि समर्पण जीवन में खुशहाली लाता है”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-14 “हर सवाल का जवाब देना जरूरी नहीं होता। सामनेवाला चिल्ला रहा है, गुस्सा कर रहा है तो आप शांत रहिए। वह आपे में नहीं है तो आप अपना रिमोट अपने हाथ में रखिए”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-15 “अगर तुम्हारी वजह से कोई इ्ंसान दुखी रहे तो समझ लो ये तुम्हारे लिए सबसे बड़ा पाप है, ऐसे काम करो कि लोग तुम्हारे जाने के बाद दुखी होकर आसूं बहाए तभी तुम्हें पुण्य मिलेगा”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-16 “गुलाब कांटों में भी हंसता है इसलिए लोग उसे प्रेम करते हैं, तुम भी ऐसे काम करो कि तुमसे नफरत करने वाले लोग भी तुमसे प्रेम करने पर विवश हो जायें”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-17 “इंसान को आप दिल से जीतो तभी आप सफल हैं, तलवार के बल पर आप जीत हासिल कर सकते हैं लेकिन प्यार नहीं पा सकते हैं”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-18 “अपने अंदर इंसान को सहनशक्ति पैदा करनी चाहिए क्योंकि जो सहता है वो ही रहता है, जो नहीं सहता वो टूट जाता है”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-19 “पूरी दुनिया को आप चमड़े से ढ़क नहीं सकते हैं लेकिन आप अगर चमड़े के जूते पहनकर चलेंगे तो दुनिया आपके जूतों से ढ़क जायेगी, यही जीवन का सार है”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-20 “जीवन में शांति पाने के लिए क्रोध पर काबू पाना सीख लो। जिसने जीवन से समझौता करना सीख लिया वह संत हो गया। वर्तमान में जीने के लिए सजग और सावधान रहने की आवश्यकता है”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-21 “जिसके भाग्य में जो लिखा है, उसे वही मिलेगा और परेशान होने से कुछ अतिरिक्त प्राप्त नहीं होने वाला। सर्वोच्च सत्ता ईश्वर के ही हाथ में है। अत: यदि वह आपसे नाराज है तो दुनिया की कोई ताकत आपकी मदद नहीं कर सकती”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-22 “यदि कोई आपको गालियां देता है और आप उसे स्वीकार नहीं करते तो वह गालियां उसी के पास रह जाती हैं। कोई आपको कुत्ता कहता है तो आप उसे भौंकें नहीं बल्कि मुस्कुराएं। गालियां देने वाला स्वयं ही शर्मिन्दा हो जाएगा। अन्यथा सचमुच कुत्ता बन जाओगे”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-23 “शादी करना है तो जागते हुए करो। परिजनों की मर्जी को दरकिनार कर घर से भागने की प्रवृत्ति आपके जीवन को अंधकारमय बना सकती है”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-24 “युवतियां कभी भी घर से भागकर शादी मत करना। विधर्मी से शादी करने पर आपको वह सब भी करना पड़ सकता है जिसकी कल्पना आपने कभी न की होगी। तीन घंटे की फिल्म तथा वास्तविक जीवन में काफी अंतर होता है। अत: जागृत अवस्था में रहकर कोई भी कार्य करो”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-25 “सत्य का रास्ता कठिन है। इस रास्ते पर हजार चलने की सोचते हैं, मगर सौ ही चल पाते हैं। 900 तो सोचकर ही रह जाते हैं और उनमे से केवल 10 ही पहुंच पाते हैं; उनमें से भी 90 तो रास्ते में ही भटक जाते हैं उनमें से भी सिर्फ एक ही सत्य को उपलब्ध हो पाता है और नौ फिर किनारे पर आ कर डूब जाते हैं तभी तो कहते हैं कि सत्य एक है और याद रखें सत्य परेशान तो हो सकता है लेकिन पराजित नहीं”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-26 “आज विज्ञापन और मार्केटिंग का जमाना है। किसी दुकान का माल कितना ही अच्छा क्यों ना हो, यदि उसकी पैकिंग और विज्ञापन आकर्षक ना हो तो वह दुकान चलती नहीं है। जैन धर्म के पिछड़ेपन का कारण भी यही है। जैन धर्म के सिद्धांत तो अच्छे हैं, लेकिन उसकी पैकिंग और मार्केटिंग अच्छी नहीं है। अहिंसा एकांत और अपरिग्रह जैसे महत्वपूर्ण सिद्धांत पर आधारित जैन धर्म “जन धर्म” बनने की क्षमता रखता है, लेकिन उसका व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार ना होने के कारण आज वह पिछड़ गया है”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-27 “श्मशान गांव के बाहर नहीं, बल्कि शहर के बीच चौराहे पर होना चाहिए । श्मशान उस जगह होना चाहिए जहां से आदमी दिन में 10 बार गुजरता है ताकि जब- जब वह वहां से गुजरे तो वहां जलती लाशे और अधजले मुर्दों को देख कर उसे भी अपनी मृत्यु का ख्याल आ जाए और अगर ऐसा हुआ तो दुनिया के 70 फ़ीसदी पाप और अपराध शब्द खत्म हो जाएंगे। आज का आदमी भूल गया है कि कल उसे मर जाना है तुम कहते जरूर होंगे एक दिन सभी को मर जाना है, पर उन मरने वालों में तुम अपने आप को कहा गिनते हो?”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-28 “धर्म पगड़ी नहीं, जिसे घर से दुकान के लिए चले तो पहन लिया और दुकान पर जाकर उतारकर रख दिया। धर्म तो चमड़ी है, जिसे अपने से अलग नहीं किया जा सकता। धर्म तो आत्मा का स्वभाव है। धर्म के माने प्रेम, करुणा और सद्भावना है। उसका प्रतीक फिर चाहे राम हो या रहीम, बुद्ध हो या महावीर, कृष्णा हो या करीम, सब की आत्मा में धर्म की एक ही आवाज होगी। धर्म दीवार नहीं, द्वार है, लेकिन दीवार जब धर्म बन जाती है तो अन्याय और अत्याचार को खुलकर खेलने का अवसर मिल जाता है। फिर चाहे वह दीवार मंदिर की या मस्जिद की ही क्यों ना हो?”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-29 “दिल्ली का सफर करना हो तो कितनी तैयारी करते हो और मौत के लिए? मौत का सफर भी बड़ा लंबा है। इस सफ़र में अंधेरे रास्तों से गुजरना पड़ता है और रास्ते में दाएं बाएं मुडने के न कोई निशान होते हैं ना ही किसी मोड़ पर हरी लाल बत्ती जल रही होती है। इतना ही नहीं चीख-पुकार करने पर भी कोई सुनने वाला नहीं मिलता। यहां तुम्हारे घर में चाहे अन्न के भंडार भरे पड़े हो, पर वहां सफर में आटे की एक चुटकी भी साथ नहीं ले जा सकते। भीषण गर्मी में जान सूखती है, पर नीम का एक पत्ता तक सिर ढकने को नहीं मिलता। संकट की इस घड़ी में सिर्फ भगवान का नाम ही सहारा होता है”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-30 “अब संत-मुनियों को अपने प्रवचन साधारण जनता के बीच करने की अपेक्षा लोकसभा और विधानसभाओं में करनी चाहिए, क्योंकि खतरनाक लोग वहीं मौजूद है। मेरा विश्वास है अगर देश और प्रदेश की राजधानियों में बैठे करीब 90000 लोग सुधर जाए तो देश की सवा अरब जनता अपने आप और रातों-रात सुधर जाएगी। सुधार की प्रक्रिया नीचे से नहीं ऊपर से शुरू होनी चाहिए। क्योंकि भ्रष्टाचार की गंगोत्री ऊपर से नीचे की ओर बहती है। अगर ऋषिकेश में गंगा का शुद्धिकरण हो जाए तो हरिद्वार और उसके नीचे के तमाम घाट स्वत: शुद्ध होते चले जाएंगे”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-31 “किसी की अर्थी को सड़क से गुजरते हुए देखकर यह मत कहना कि बेचारा चल बसा अपितु उस अर्थी को देख कर सोचना कि एक दिन मेरी अर्थी भी इन्हीं रास्तों से यूं ही गुजर जाएगी और लोग सड़क के दोनों ओर खड़े होकर देखते रह जाएंगे। उस अर्थी से अपनी मृत्यु का बोध ले लेना क्योंकि दूसरों की मौत तुम्हारे लिए एक चुनौती है। अर्थी उठने से पहले जीवन का अर्थ समझ लेना, वरना बड़ा अनर्थ हो जाएगा। वैसे गधे को कभी नहीं लगता कि उसका जीवन व्यर्थ है”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-32 “दो बातों का ध्यान रखें। एक, टीवी देखते हुए भोजन ना करें। दो, अखबार पढ़ते हुए चाय न पियें। आज के जीवन में ये दो जबरदस्त बुराइयां हैं। आप इन्हें अविलंब सुधार लें, क्योंकि जब आप TV देखते हुए खाना खाते हैं और अखबार पढ़ते हुए चाय पीते हैं तो आप सिर्फ खाना और चाय नहीं खाते-पीते, बल्कि उस टीवी और अखबार में हिंसा, अश्लीलता, भ्रष्टाचार की खबरें होती हैं, उन्हें भी खा पी जाते हैं और फिर वह खबरें आपको अपने से बेखबर कर देती हैं। अगर आम आदमी अपनी ये दो आदते सुधार लें तो पूरे समाज व देश की आबो-हवा को बदल सकती है”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-33 “जिंदा रहने के लिए भोजन जरुरी है। भोजन से भी ज्यादा पानी जरुरी है, पानी से भी ज्यादा वायु जरूरी है और वायु से भी ज्यादा आयु जरूरी है, मगर मरने के लिए कुछ भी जरुरी नहीं है। आदमी यूं ही बैठे-बैठे मर सकता है। आदमी केवल दिमाग की नस फटने और दिल की धड़कन रुकने से नहीं मरता, बल्कि उस दिन भी मर जाता है जिस दिन उस की उम्मीदें और सपने मर जाते हैं; उसका विश्वास मर जाता है इस तरह आदमी मरने से पहले भी मर जाता है; और फिर मरा हुआ आदमी दोबारा थोड़ी ना मरता है”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-34 “अगर आप बाप हैं तो आपका अपने बेटे के प्रति बस एक ही फर्ज है कि आप अपने बेटे को इतना योग्य बना दें कि वह संत मुनि और विद्वानों की सभा में सबसे आगे की पंक्ति में बैठने का हकदार बने और अगर आप बेटे हैं, तो आपका अपने बाप के प्रति बस यही एक कर्तव्य है कि आप ऐसा आदर्श में जीवन जिए, जिसे देखकर दुनिया तुम्हारे बाप से पूछे कि किस तपस्या और पुण्य के फल से तुम्हें ऐसा होनहार बेटा मिला है?”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-35 “अगर जिंदगी को स्वर्ग बनाने की तमन्ना है तो पति और पत्नी, सास और बहू, बाप और बेटे को आपस में यह समझौता करना होगा कि अगर एक आग बने तो दूसरा पानी बन जाएगा। अपने घरों में थोड़े से पानी की व्यवस्था करके रखिए पता नहीं कब किसके दिल में क्रोध की आग भड़क उठे। क्रोध आग है। अपने घरों में सहनशीलता और शांति का जल तैयार रखें। पता नहीं कब तुम्हारा घर क्रोध की लपट से गिर जाए। ध्यान रखो, पति कभी क्रोध में आग बने तो पत्नी पानी बन जाए और पत्नी कभी अंगार बने तो पति जलाधार हो जाये”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-36 “कहा जाता है कि बच्चे पर मां का प्रभाव पड़ता है लेकिन आज बच्चा मां से कम मीडिया से ज्यादा प्रभावित हो रहा है। कल तक कहा जाता था कि यह बच्चा अपनी मां पर गया है और यह बाप पर। मगर आज जिस तरह से देसी विदेशी चैनल हिंसा और अश्लीलता परोस रहे हैं, उसे देख कर लगता है कि कल यह कहा जाएगा कि यह बच्चा जी टीवी पर गया है और यह स्टार टीवी पर और यह जो निखट्टू है ना, यह तो पूरे फैशन TV पर आ गया है। आज विभिन्न चैनलों द्वारा देश पर जो सांस्कृतिक हमले हो रहे हैं, वे ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादियों के हमले से भी ज्यादा खतरनाक हैं”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-37 “जवानी पर ज्यादा मत इतराना, क्योंकि जवानी सिर्फ चार दिनों की है। अतः कानों में बहरापन आवे, इससे पहले की जो सुनने जैसा है उसे सुन लेना। पैरों में लंगड़ापन आवे, इससे पहले ही दौड़-दौड़ कर तीर्थ यात्रा कर लेना। आंखों में अंधापन आवे इससे पहले ही अपने स्वरूप को निहार लेना। वाणी में गूंगापन आए, इससे पहले ही कुछ मीठे बोल लेना। हाथों में लूलापन आये, इससे पहले ही दान-पुण्य कर लेना। दिमाग में पागलपन आवे, इससे पहले ही प्रभु के हो जाना”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-38 “दुख बड़ा ढीठ मेहमान है। अगर यह तुम्हारे घर के लिए निकल पड़ा है तो पहुंचेगा जरूर। अब अगर तुम इस मेहमान को घर आते हुए देख कर सामने का दरवाजा बंद कर लो तो यह पीछे के दरवाजे से आ जाएगा। पीछे का दरवाजा बंद कर लो तो यह खिड़की में से आ जाएगा। खिड़की भी बंद कर लो तो छप्पर फाड़कर नहीं तो फर्श उखाड़कर ही आ जाएगा। ढीठ मेहमान है ना! अतः जीवन में सुख की तरह दुख का भी स्वागत करो। दुख की मेजबानी के लिए तैयार रहो। ये सोचकर कि वह दिन नहीं रहे, तो ये दिन भी नहीं रहेंगे”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-39 “यदि कोई इंजीनियर भ्रष्ट होता तो कुछेक पूल, भवन ही असमय में धराशाई होते हैं। यदि कोई डॉक्टर भ्रष्ट होता है तो कुछेक ही लोगों की अकाल मौत होती है, लेकिन यदि कोई शिक्षक भ्रष्ट होता है तो आने वाली समूची पीढ़ी बर्बाद हो जाती है। देश का भविष्य आज शिक्षक के हाथ में है क्योंकि उसके द्वार पर ही नई पीढ़ी कुछ सीखने बैठी है”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-40 “पुत्र तुम्हारी सेवा करें तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। वह तो करेगा ही क्योंकि वह आखिर तुम्हारा ही खून है लेकिन यदि पुत्रवधू सेवा करें तो यह आश्चर्य है। वह खून तो दूर खानदान तक का भी नहीं है… फिर भी सेवा कर रही है तो निश्चित ही यह तुम्हारे किसी जन्म का पुण्य फल है। आज के समय में और सब तरह के पुण्य भोगना बहुत सारे लोगों की किस्मत में है लेकिन पुत्र और पुत्र वधू की सेवा के पुण्य को भोगना खुशनसीब मां-बाप के भाग्य में है”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-41 “पड़ोसी होने का धर्म निभाइए। पड़ोसी धर्म क्या है? यही कि आप उनके यहां भोजन अवश्य करें, मगर इस बात का ख्याल रखें कि कहीं आपका पड़ोसी भूखा ना रह जाए। अच्छा पड़ोसी आशीर्वाद है। पड़ोसी के साथ कभी बिगाड़ न करें क्योंकि हम मित्रों के बिना तो जी सकते हैं लेकिन पड़ोसी के बिना नहीं। पड़ोसी के सुख दुख में सहभागी बने। क्योंकि पड़ोसी के घर में आग लगी है तो समझना तुम्हारी अपनी संपत्ति भी खतरे में है। और हां, अगर तुम आज पड़ोसी के यहां नमकीन भेजते हो तो कल वहां से मिठाई जरूर आएगी”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-42 “दस गाय दान करना बड़ा पुण्य है। मगर इसे भी बड़ा पुण्य बूचड़खाने में जाती हुई एक गाय को बचा लेना। दस मंदिर का निर्माण करना बड़ा पुण्य है, मगर इससे भी बड़ा पुण्य एक प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार करना है। दस प्राचीन मंदिरों का जीर्णोद्धार करना पुण्य है, मगर इससे भी बड़ा पुण्य एक आतंकवादी को अहिंसावादी बना देना। अगर आप अपनी प्रेरणा से एक मांसाहारी व्यक्ति को शाकाहारी बना देते हैं तो समझना आपने घर बैठे ही चार धाम की यात्रा करने का पुण्य अर्जित कर लिया”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-43 “पुत्र चार तरह के होते हैं। एक, लेनदार पुत्र- पिछले जन्म का लेनदार था पुत्र होकर आया। अब उसे पढ़ाओ, लिखाओ, युवा करो उसका लेनदेन पूरा होगा और वह चल बसेगा। दूसरा, दुश्मन पुत्र- पिछले जन्म का दुश्मन भी पुत्र होकर आ जाता है। ऐसा पुत्र कदम-कदम पर दुख देता है। तीसरा, उदासीन पुत्र ऐसा पुत्र मां-बाप को ना सुख देता है ना दुख। बस कहने को पुत्र होता है। चौथा, सेवक पुत्र- पिछले जन्म में तुमने किसी की सेवा की, वही तुम्हारा पुत्र बनकर आ गया। ऐसा पुत्र मां-बाप को बड़ा सुख देता है”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन-44 “पैर से अपाहिज एक भिखारी हमेशा प्रसन्न और खुश रहता था। किसी ने पूछा “अरे भाई! तुम भिखारी हो, लंगड़े भी हो, तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है फिर भी तुम इतने खुश रहते हो”। क्या बात है? वह बोला, “बाबूजी! भगवान का शुक्र है कि मैं अंधा नहीं हूं, भले ही मैं चल नहीं सकता, पर देख तो सकता हूं, मुझे जो नहीं मिला मैं उसके लिए प्रभु से कभी कोई शिकायत नहीं करता बल्कि जो मिला है उसके लिए धन्यवाद जरूर देता हूं” यही है दुख में से सुख खोजने की कला”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

प्रवचन- 45 “इस मतलबी दुनिया को ध्यान से नहीं, धन से मतलब है। भजन से नहीं, भोजन से व सत्संग से नहीं, राग-रंग से मतलब है। सभी पूछते हैं कि घर, परिवार व व्यापार कितना है। कोई नहीं पूछता कि भगवान से कितना प्यार है”-राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज

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